Ramayan Story: सीता माता को खोजने के लिए गिद्ध राज संपाति ने सुझाया ऐसा रास्‍ता! सच हुई मुनि की बात
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Ramayan Story: सीता माता को खोजने के लिए गिद्ध राज संपाति ने सुझाया ऐसा रास्‍ता! सच हुई मुनि की बात

Ramayan Story in Hindi: सीता माता की खोज न कर पाने से निराशा में बैठे वानरों के पास गिद्धराज संपाति आया. उसे देखकर पहले तो वानर डर गए लेकिन फिर उसने आश्वस्त किया कि वह किसी को खाएगा नहीं तो सब निश्चिंत हो गए. अपने भाई जटायु का श्राद्धकर्म करने के बाद संपाति ने मुनि चंद्रमा द्वारा बताई कथा सुनाई और माता सीता का पता बताया. 

फाइल फोटो

Ramayan Story of Sampati told Sita Ji address: सीता माता की खोज को निकले युवराज अंगद आदि वानर जब उन्‍हें नहीं खोज पाए और निराश हो गए तो जामवंत जी ने उन सबको ढांढस बंधाया. उन्‍होंने कहा कि जो कुछ भी हो रहा है वह सब प्रभु श्री राम की लीला है. मनुष्य जीवन में अवतार लेकर वे जनमानस के लिए मर्यादा तैयार कर रहे हैं इसलिए निराश न हों. 

गिद्धराज जटायु के भाई ने बताई ऐसी बात 

इसी वार्तालाप के समय गिद्धराज संपाति वहां पहुंचे और जब उन्हें बताया गया कि उनके भाई गिद्धराज जटायु ने प्रभु श्री राम की सेवा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए तो फिर वह समुद्र किनारे उस स्थान पर पहुंचे और वहां जाकर अपने भाई का श्राद्ध कर्म किया. फिर संपाति ने अपने दोनों भाइयों के बीच सूर्यदेव तक पहुंचने की प्रतियोगिता और अपने पंख जलने की कथा सुनाते हुए चंद्रमा नाम के मुनि द्वारा कही गई कथा दोहराई.

मुनि चंद्रमा की बात हुई सत्‍य 

मुनि चंद्रमा के अनुसार त्रेता युग में परब्रह्म परमेश्वर मनुष्य शरीर धारण करेंगे और उनकी स्त्री को एक बलशाली राक्षस छल से चुरा कर ले जाएगा. उस राक्षस की खोज में प्रभु दूत भेजेंगे. उन दूतों से मिल कर तू पवित्र हो जाएगा और तेरे पंख उग आएंगे, तब तक तू धैर्य रख और चिंता न कर. बस, प्रभु के दूतों को प्रभु की पत्नी का पता बता देना. संपाति ने कहा कि मुनि की वाणी अब सत्य सिद्ध हो गई है. अब मैं जैसा कहता हूं, वैसे ही तुम लोग प्रभु की सेवा करो.

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संपाति ने बताया रावण और लंका का पता

संपाति ने प्रभु श्री राम के उन दूतों से कहा कि त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है. वहां पर निडर स्वभाव का रावण रहता है और वहीं लंका में अशोक नाम का बगीचा है जहां पर उसने सीता जी को चुरा कर रखा हुआ है. संपाति ने कहा कि मैं देख रहा हूं कि इस समय सीता जी सोच में मग्न होकर बैठी हैं. संपाति ने कहा कि मैं अपनी दूर दृष्टि से उनको देख तो पा रहा हूं किंतु बूढ़ा होने के कारण तुम लोगों की कोई मदद नहीं कर सकता हूं. 

उसने कहा कि तुम लोग निराश न हो. जो सौ योजन का समुद्र को लांघने की क्षमता रखने के साथ ही बुद्धिमान भी होगा वही प्रभु श्री राम जी का काम कर सकेगा. श्री रघुनाथ जी सब पर कृपा करने वाले हैं, मुझे ही देखो उनकी कृपा से देखते ही देखते बिना पंख वाला बेहाल शरीर अब पंख उगने से सुंदर हो गया है. श्री राम का नाम लेने से पापी भी तर जाता है फिर तुम लोग तो उनके दूत हो इसलिए कायरता छोड़ कर श्री राम को हृदय में धारण कर उपाय करो. इतना बोल कर गिद्ध संपाति वहां से चला गया. 

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