Popcorn History: खेतों में उगने वाला मक्का ऐसे बना गया सिनेमाघरों का पॉपकॉर्न, बेहद दिलचस्प है कहानी
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Popcorn History: खेतों में उगने वाला मक्का ऐसे बना गया सिनेमाघरों का पॉपकॉर्न, बेहद दिलचस्प है कहानी

National Popcorn Day 2023: फिल्म देखते समय सबसे ज्यादा खाए जाने वाली चीज पॉपकॉर्न खेतों से निकलकर सिनेमा हॉल तक कैसे पहुंची. मौजूदा दौर में आपको ज्यादातर सिनेमा हॉल में पॉपकॉर्न वाली सुविधा मिल जाती है. आइए जानते हैं कि सिनेमा हॉल में पॉपकॉर्न बिकने की शुरुआत कैसे हुई?

 

फाइल फोटो

Popcorn America History: सिनेमाघरों में मिलने वाले स्नैक्स के दामों को लेकर अक्सर बवाल होता रहता है. कई जगहों पर 250 रुपये तो कहीं पर 500 रुपये तक के पॉपकॉर्न मिलते हैं. बाजार में 10 रुपये से 20 रुपये वाला समोसा आपको सिनेमा हॉल के अंदर 50 से 100 रुपये के बीच मिलता है, कहीं-कहीं के दाम 200 रुपये भी चले जाते हैं. कई ग्राहकों की शिकायत होती है कि जितने महंगे सिनेमा हॉल के टिकट नहीं होते, उससे ज्यादा महंगे वहां मिलने वाले स्नैक्स होते हैं. सिनेमा हॉल में खाने-पीने के सामानों को लेकर बात अक्सर होती है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फिल्म देखते समय सबसे ज्यादा खाए जाने वाली चीज पॉपकॉर्न खेतों से निकलकर सिनेमा हॉल तक कैसे पहुंची? मौजूदा दौर में आपको ज्यादातर सिनेमा हॉल में पॉपकॉर्न की सुविधा मिल जाती है. आइए जानते हैं कि सिनेमा हॉल में पॉपकॉर्न बिकने की शुरुआत कैसे हुई?

19 जनवरी को दुनिया भर में मनाया जाता है पॉपकॉर्न डे

पॉपकॉर्न का इतिहास बताना शुरू करें, उससे पहले बता देते हैं कि 19 जनवरी को दुनिया भर में पॉपकॉर्न डे मनाया जाता है. पॉपकॉर्न बनाने वाली बिजनेस मशीन का इजाद साल 1885 हुआ जिसे चार्ल्स क्रेटर्स ने बनाया था. इसी समय के आसपास एक और पॉपकॉर्न मशीन बनाई गई जिससे कैरेमल पॉपकॉर्न निकलते थे. इस नई पॉपकॉर्न मशीन का इजाद Ruceckheim द्वारा किया गया था. दोनों ही पॉपकॉर्न बेहद स्वादिष्ट थे और देखते ही देखते पूरे अमेरिका भर में फेमस हो गए. साल 1896 में क्रैकरजैक नाम से बिक रहे पॉपकॉर्न ने ग्राहकों का दिल जीत लिया था.

अमेरिका की मंदी और पॉपकॉर्न का बाजार

साल 1920 तक आते-आते अमेरिका के मेले, स्ट्रीट और दुसरी जगहों पर पॉपकॉर्न काफी फेमस हो गया था. साल 1920 का ही दौर था जब निकलोडियन ने एक ऐसी चीज का आविष्कार किया जिसकी मदद से लोग अपने घरों के अंदर ही मोशन पिक्चर्स देख सकते थे इसे इंडो एग्जिबिशन स्पेस कहा गया. निकलोडियन की इस खोज के बाद सिनेमाघरों में लोगों का अकाल पड़ने लगा था. वापस लोगों को सिनेमा हॉल की ओर खींचने के लिए उनके मालिकों ने तरह-तरह के प्रयोग किए जिसके बाद से सिनेमा हॉल को किसी महल की तरह सजाया गया तो कहीं बड़े झूमर लगाए गए, उसके साउंड क्वालिटी में सुधार किया गया और बेहतर एक्सपीरियंस के लिए पर्दों में कई बदलाव किए गए लेकिन 1929 के दौर में जब अमेरिका को मंदी का मुंह देखना पड़ा, तब देश के बड़े बड़े अमीरों ने भी सड़कों पर आकर पॉपकॉर्न का ठेला लगाया.

पॉपकॉर्न ने किया मालामाल

पॉपकॉर्न बेचकर लोगों की अच्छी कमाई हो रही थी जो लोग सिनेमा हॉल में फिल्म देखने आते वो लोग सड़कों पर बाहर आकर पॉपकॉर्न जरूर खाते थे. ऐसे में ज्यादातर पॉपकॉर्न के ठेले सिनेमा हॉल के बाहर लगने लगे थे. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी थे जो चोरी-छुपे सिनेमा हॉल के अंदर भी पॉपकॉर्न लेकर जाते थे. इनमें ही एक Kammons नाम का शख्स था जो सिनेमा हॉल के बाहर पॉपकॉर्न बेचा करता था जिसने पॉपकॉर्न बेचकर खूब मुनाफा कमाया. देखते-देखते उसकी आमदनी सिनेमा हॉल के मालिक से ज्यादा हो गई फिर 1 दिन सिनेमा हॉल के मालिक ने उसकी दुकान हटाकर खुद पॉपकॉर्न की दुकान खोल दी. Kammons कोई और नहीं हॉलीडे इन होटल चेन के मालिक थे.

ऐसे सिनेमा हॉल में पहुंचा पॉपकॉर्न

R.J Mekkena वह पहले सबसे शख्स थे जिन्होंने सिनेमा हॉल के अंदर पॉपकॉर्न बेचना शुरू किया और देखते-देखते खूब मुनाफा कमाया लेकिन इस दौरान छोटे-छोटे थियेटरों में पॉपकॉर्न वाली सुविधा मौजूद थी जिससे थिएटर को भी फायदा होता था. इसी फायदे को देखते हुए बड़े आलीशान थियेटरों ने भी पॉपकॉर्न बेचने की स्कीम अपनाई और उनको भी दर्शकों का अच्छा रिस्पांस मिला और इस तरह खेतों में उगने वाला मक्का हमारे सिनेमा हॉल तक पहुंचा और उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई बाद में पॉपकॉर्न सिनेप्रेमियों का पसंदीदा स्नैक्स बन गया.

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