Sawan Kavad Niyam: कांवड़ में क्यों भरा जाता है गंगाजल, क्या है इसके पीछे का कारण
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Sawan Kavad Niyam: कांवड़ में क्यों भरा जाता है गंगाजल, क्या है इसके पीछे का कारण

Kavad Rules: सावन का महीना भगवान शिव को बेहद प्रिय है. इस माह में शिव भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए कावड़ लेकर शिव धाम जाते हैं और वहां से गंगाजल कावड़ में भरकर लाते हैं. क्या आप जानते हैं कावड़ में गंगाजल क्यों भरा जाता है. 

 

kavad yatra

Sawan Kavad Yatra: सावन महीने में शिव भक्त एक यात्रा पर निकलते हैं, जिसे कांवड़ यात्रा कहा जाता है. माना जाता है शिव को प्रसन्न करके मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए लोग कावड़ लेकर शिव धाम जाते हैं. माता पार्वती और पिता शिव को कंधे पर लेकर चलने का भाव ही कांवड़ यात्रा है. श्रावण मास के दौरान लाखों की संख्या में शिवभक्त  भोले बाबा का जयकारा लगाते हुए का धूमधाम के साथ हरिद्वार, गंगोत्री सहित अन्य कई शिव धाम की यात्रा के लिए निकल पड़ते है. कांवड़ यात्रा 28 दिनों की होती है. सावन के पहले दिन से लेकर सावन के अंतिम दिन तक यह यात्रा चलती रहती है. कांवड़ का अर्थ “कंधों पर रखा हुआ” होता है. लकड़ी की एक डंडी  जिसके दोनों सिरों पर एक-एक पात्र रहता है, जिसे लोग कंधे पर रखकर पहले गंगा नदी पहुंचते है और वहां से जल लेने के बाद किसी भी शिवधाम पर पहुंचकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. गंगा प्रिय होने के कारण भगवान भोलेनाथ ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया है, इसलिए शिव को प्रसन्न करने के लिए लोग उनका गंगाजल से जलाभिषेक करते हैं.

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कांवड़ यात्रा की शुरुआत

कांवड़ यात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित है. जिसमें से एक मान्यता यह भी है कि श्रवण कुमार ने इस यात्रा की शुरुआत की थी. माता-पिता की इच्छा अनुसार उन्हें कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार लाए और गंगा स्नान कराया था.

पुराण के अनुसार कांवड़ यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन से जुड़ी है. ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था. विष के ताप को कम करने के लिए शिव के अनन्य भक्त रावण ने गंगाजल से भरे कांवड़ से उनका जलाभिषेक किया. जिसके बाद से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई.

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कांवड़ से जुड़े नियम

- कांवड़ यात्रा करते समय चमड़े का कोई भी सामान नहीं ले जाना चाहिए.

- यात्रा के दौरान बीड़ी, मदिरा, भांग, मांस का सेवन नहीं किया  जाता है, सात्विक रहना है.

- यात्रा के दौरान किसी भी तरह के सौन्दर्य प्रसाधन जैसे- साबुन, तेल, इत्र आदि का प्रयोग नहीं किया जाता है.

- कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है, किसी ऊंची जगह पर रखने के बाद ही लेटना या बैठना चाहिए.

- गंगा जल भरने से पहले कांवड़िए  को व्रत रखना चाहिए.

- सूर्योदय के दो घंटे  पहले और सूर्यास्त के दो घंटे बाद तक ही यात्रा करनी है.

- जमीन पर विश्राम करना चाहिए, बिस्तर का प्रयोग नहीं करना है, यानी कि किसी भी प्रकार की सुख सुविधा का भोग नहीं करते हैं.

- यात्रा के दौरान बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए.

- अपने अंदर असुरी प्रवृत्ति नहीं लानी है क्योंकि आप शिव से जुड़ रहे हैं.

 

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