जनजातीय महोत्सव में बोले CM हेमंत सोरेन-पर्यावरण की रक्षा करनी है तो आदिवासियों को बचाना होगा
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जनजातीय महोत्सव में बोले CM हेमंत सोरेन-पर्यावरण की रक्षा करनी है तो आदिवासियों को बचाना होगा

सोरेन ने रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित झारखंड जनजातीय महोत्सव-2022 को संबोधित करते हुए कहा, 'जानवर बचाओ, जंगल बचाओ सब बोलते हैं पर आदिवासी बचाओ कोई नहीं बोलता. अगर आदिवासी को बचाएंगे तो जंगल जीव-जंतु सब बच जाएगा.'

 (फाइल फोटो)

Ranchi: मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने झारखंड जनजातीय महोत्सव के उद्घाटन किया. इस दौरान CM हेमंत सोरेन ने मंगलवार को कहा कि जनजातीय समुदाय एक स्वाभिमानी समुदाय है, जिसे कोई झुका नहीं सकता, कोई डरा नहीं सकता और न ही कोई हरा सकता है. उन्होंने कहा, 'पर्यावरण की रक्षा करनी है, तो आदिवासियों को बचाना होगा, जल, जंगल, जीव-जंतु सभी अपने आप बच जाएंगे.' 

सोरेन ने रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित झारखंड जनजातीय महोत्सव-2022 को संबोधित करते हुए कहा, 'जानवर बचाओ, जंगल बचाओ सब बोलते हैं पर आदिवासी बचाओ कोई नहीं बोलता. अगर आदिवासी को बचाएंगे तो जंगल जीव-जंतु सब बच जाएगा.' उन्होंने कहा, 'आज आदिवासी समाज के समक्ष अपनी पहचान को लेकर संकट खड़ा हो गया है. क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि जिस अलग भाषा संस्कृति-धर्म के कारण हमें आदिवासी माना गया उसी विविधता को आज के नीति निर्माता मानने के लिए तैयार नहीं हैं?' 

दुमका में भी निकाली गई रैली

दुमका में विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. इस मौके पर दुमका के एसपी महिला कॉलेज से आदिवासी युवा और महिलाओं ने विशाल रैली निकाली.  इस दौरान छात्र छात्राओं के बीच आदिवासी संस्कृति एवं परम्परा की झलक देखने को मिली. आदिवासियों द्वारा दुमका के विभिन्न चौकों में स्थित प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया गया. रैली दुमका के महिला कॉलेज से निकलकर बिरसा मुंडा चौक से भीमराव अम्बेडकर चौक होते हुए सीधो कान्हू चौक होते हुए संथाल परगना महाविद्यालय पहुँचीए जहां विश्व आदिवासी दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

इस दौरान आदिवासी समाज के द्वारा सरकार से 1932 आधारित खतियान झारखंड में लागू करने की भी मांग की गई. आदिवासी समाज में महिलाओं की स्थितिए आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारए आदिवासी युवाओं के भविष्य पर भी सवाल खड़े किए गये. आदिवासी युवाओं की मानें तो आज आदिवासी समाज काफी पिछड़ा है व आज भी आदिवासी समाज मूलभूत सुविधा से वंचित है. उन्हें आज सशक्त बनाने की जरूरत है. वर्ष 1993 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आदिवासियों का दशक घोषित किये जाने के बाद से विश्व आदिवासी दिवस मनाने की परम्परा की शुरुआत हुई थी, लेकिन आज भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में बसने वाले आदिवासी समाज के लोग सड़क बिजली पानी के लिए तरस रहे हैं. 

(इनपुट: भाषा)

 

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