Bharatpur: केवलादेव नेशनल पार्क से साइबेरियन क्रेन के बाद इंडियन सारस ने भी मुहं मोडा, प्रजाति बचाने में जुटे चार दोस्त
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Bharatpur: केवलादेव नेशनल पार्क से साइबेरियन क्रेन के बाद इंडियन सारस ने भी मुहं मोडा, प्रजाति बचाने में जुटे चार दोस्त

Bharatpur News: भरतपुर में पक्षियों का स्वर्ग कहे जाने वाले विश्वविख्यात केवलादेव नेशनल पार्क से पहले साइबेरियन क्रेन और अब इंडियन सारस भी मुंह मोडने लगे हैं.  मार्च 2022 में हुई सारस की सेंसेक्स में पार्क में 6 और पूरे भरतपुर जिले में इसकी संख्या 14 के करीब बची है.

इंडियन सारस

Bharatpur News: भरतपुर में पक्षियों का स्वर्ग कहे जाने वाले विश्वविख्यात केवलादेव नेशनल पार्क से साइबेरियन क्रेन के बाद अब इंडियन क्रेन ने भी मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है. जिसके चलते अब पार्क में इंडियन क्रेन की संख्या मात्र 6 रह गई है, जबकि पूरी दुनिया से इसे देखने के लिये पर्यटक यहां आते हैं. इन सबके बीच अच्छी खबर यह है कि विलुप्त होते इंडियन सारस को बचाने के लिये चार दोस्तों ने पहल शुरू कर दी है. इन चार दोस्तों ने चार साल में 36 सारस बचायें है और इनकी मुहिम लगातार जारी है. बता दें कि इंडियन सारस जो धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर हैं, उसे बचाने के लिए चार दोस्तों ने एक मुहीम छेड़ रखी है. चारों दोस्त इसके लिए उत्तर प्रदेश सहित राजस्थान के कई इलाकों में घूम रहें हैं. 

घट रही है इंडियन सारस की संख्या

केवलादेव नेशनल पार्क के डीएफओ सुमित बंसल ने बताया कि पिछले कुछ समय से पार्क में इंडियन क्रेन की संख्या घटी है जिसके पीछे पार्क में सारस के लिये वेटलेंड सहित अनुकूल वातावरण में कमी आना और पार्क में पिछले कुछ समय पानी की कमी का होना है. यही वजह है कि अब सारस पार्क के बाहर जहां अन्य वॉटर बॉडीज है वहां पर अपना नया ठिकाना बना रही है. गत मार्च 2022 में हुई सारस की सेंसेक्स में पार्क में 6 और पूरे भरतपुर जिले में इसकी संख्या 14 रही थी. 5 फुट 11 इंच तक की ऊंचाई की इंडियन सारस जो हमारे देश ही पाई जाती है उसकी संख्या अब धीरे-धीरे घटती जा रही है. जिसके लिए चार दोस्त लल्ला मुत्थु, कैलाश नवरंग, अनवर कुरैशी, मदन मोहन जो वाइल्ड लाइफ नेचुरलिस्ट है एक मुहीम छेड़ी थी. इस मुहीम के जरिए वे अभी तक 36 सारस बचा चुके हैं. जिस खेत में सारस अपना घोंसला बनाती है, उस किसान को चारों दोस्त 2 हजार रुपये भी देते हैं क्योंकि सारस गेहूं और चावल के खेतों में अपने घोंसले बनाकर बच्चों को जन्म देती हैं.

जमीन से 2 फुट ऊपर बनाती है घोंसला

इंडियन सारस मुख्यत चावल, गेहूं और कीट खाती है. इंडियन सारस का जोड़ा बच्चों को जन्म देने से पहले चावल और गेहूं का खेत ढूंढता है. ऐसा खेत जिसमें पानी भरा हो, क्योंकि खेत में पानी भरा होने के कारण कोई भी जानवर आसानी से उनके घोंसले तक नहीं पहुंच पाता है. जब सारस के जोड़े को जगह पसंद आ जाती है तो सारस चावल या गेहूं को इकठ्ठा करते हैं और जमीन से करीब 2 फुट ऊंचाई पर एक घोंसला बनाते हैं. घोंसला बनाने के बाद सारस एक अंडा देती है और उसे वह करीब 3 दिन तक देखती है, जब उसे लगता है की उसके अंडे को कोई खतरा नहीं है तो वह दूसरा अंडा देती है. इसी तरह से वह तीन से चार अंडे देती है. 28 दिन बाद अंडे से बच्चा निकल जाता है, जब अंडे से बच्चे निकल जाते हैं तो बड़ा बच्चा छोटे बच्चों को मारने की कोशिश की करता है. वह करीब 15 दिन तक घोंसले में रूकती है और 15 दिन बाद वहां से चली जाती है और बच्चों को अपने गुर सिखाती है. रात में सारस जहां भी रुकते हैं उस समय एक सारस जागता है और दूसरा सोता है, जिससे कोई खतरा हो तो वह पहले से भांप सके. उस स्थिति एक सारस 24 घंटे बच्चों की देखभाल करता है और दूसरा सारस खाना लेकर आता है. इंडियन सारस का पसंदिता खाना कच्चा चावल होता है.

सारस के घोंसला बनाने से किसान को होता है नुकसान

वाइल्ड लाइफ नेचुरलिस्ट कैलाश नवरंग ने बताया की सारस जब घोंसला बनाती है तो चावल या गेहूं का बनाती है इस स्थिति में किसान को नुकसान होता है तो, किसान अपने खेत से सारस का घोंसला हटा देते हैं. इसलिए किसानों को उनके नुकसान का चारों दोस्त मिलकर करीब 2 हजार रुपये पर किसान को देते हैं, जिससे उनके खेत में सारस अपने बच्चों को जन्म दे सके और विलुप्त होती प्रजाति को बचाया जा सके. 

22 किसानों को दे चुके हैं पैसा

कैलाश नवरंग ने बताया की, अभी तक वह 22 किसानों को पैसा दे चुके हैं. जिससे किसान अपने खेतों में सारस को घोंसला बनाने देते हैं और जब वह बड़े हो जाते है तो वह घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं. उन्होंने बताया की इंडियन सारस हाईटेंशन लाइनों से टकरा कर जाती है जिससे इनकी मौत हो रही है.

Reporter - Devendra Singh 

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