दाऊदी बोहरा मुसलमान के इस प्रथा की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट; 11 अक्टूबर से सुनवाई
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दाऊदी बोहरा मुसलमान के इस प्रथा की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट; 11 अक्टूबर से सुनवाई

Social Boycott Practice in Bohra Muslims: दाऊदी बोहरा समाज में सालों से चली आ रही सामाजिक बहिष्कार की प्रथा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट सुनवाई और जांच करेगी कि क्या यह प्रथा भारतीय कानून सामाजिक बहिष्कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम के खिलाफ तो नहीं है? 

अलामती तस्वीर

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इस बात की जांच करने के लिए तैयार हो गया कि क्या दाऊदी बोहरा समुदाय में किसी को अपने समाज से बाहर निकाल देने की प्रथा, 2016 के सामाजिक बहिष्कार (रोकथाम, निषेध और निवारण) कानून के खिलाफ तो नहीं है. 

जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच 11 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी तरफ से आग्रह किया गया कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है और इसे सबरीमाला पीठ के पास भेज दिया जाए. वहीं, बोहरा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने दलील दी थी कि 2016 का अधिनियम सामाजिक बहिष्कार के सभी पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करता है और धार्मिक निकाय द्वारा सामाजिक बहिष्कार की आशंका के मामले में निकटतम मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज की जा सकती है. इसलिए, मामले में उठाए गए प्रश्न विवादास्पद हो गए है.

1962 में, शीर्ष अदालत ने माना था कि दाऊदी बोहरा समुदाय के धार्मिक विश्वास और सिद्धांतों ने अपने धार्मिक प्रमुखों को संविधान के अनुच्छेद 26 (बी) के तहत उनके ’धार्मिक मामलों के प्रबंधन’ के हिस्से के रूप में बहिष्कार की शक्ति दी थी. यह फैसला बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्यूनिकेशन एक्ट 1949 की धारा 3 को चुनौती देने पर आया था.
शीर्ष अदालत के समक्ष यह तर्क दिया गया है कि 2016 के कानून के बाद, 1949 का कानून अस्तित्वहीन हो गया था और अब बहिष्कार कानूनी रूप से संभव नहीं है, और वर्तमान कानून कई तरह के सामाजिक बहिष्कार से संबंधित है. मामले में एक अन्य वकील ने तर्क दिया कि सामाजिक बहिष्कार पर एक सामान्य कानून बहिष्कार का सामना कर रहे बोहरा समुदाय के सदस्यों की रक्षा के लिए काफी नहीं होगा.

पीठ को सूचित किया गया है कि बहिष्कार, 1962 के फैसले के माध्यम से, संविधान के अनुच्छेद 26 (बी) के तहत एक धार्मिक प्रथा के रूप में संरक्षित किया गया था. एक वकील ने कहा कि उनके मुवक्किलों ने इस प्रथा को चुनौती दी है. यह दलील दी गई थी कि समुदाय के धार्मिक प्रमुख स्वयं कभी नहीं कहेंगे कि बहिष्कार बुरा है.
2016 के अधिनियम ने 16 प्रकार के सामाजिक बहिष्कार की पहचान की थी और उन्हें अवैध बना दिया था. ऐसा करने वाले अपराधियों को तीन साल तक के कारावास की सजा का भी प्रावधान किया गया था. 

 क्या होता है समाजिक बहिष्कार 
गौरतलब है कि दाऊदी बोहरा समुदाय के लोगों को समुदाय का मुखिया जो पूरे देश और दुनिया भर में फैले बोहरा समाज का धार्मिक गुरू होता है, वह अपने सदस्यों को एक पहचान पत्र जारी करता है. सदस्यों से आशा की जाती है कि वह धर्म गुरु के सभी आदेशों का सख्ती से पालन करे. सदस्यों को साल में एक निश्चित रकम भी धर्म गुरु के पास दाप स्वरूप देना होता है. अगर कोई इसके नियमों का पालन नहीं करता है, या उसके खिलाफ किसी तरह की आवाज उठाता है, तो उस सदस्य के खिलाफ कार्रर्वाठ की जाती है. उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है. उसे दाऊदी बोहरा समाज के कब्रिस्तान, मस्जिद, मदरसे और सभी धार्मिक और सामाजिक क्रियाकलापों से बाहर कर दिया जाता है. इस प्रथा का उसी समाज के कुछ लोग विरोध करते रहे हैं.

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