Phoolan Devi: ये सियासत की इच्छा है कि फूलन देवी जिंदा रहें... ?
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Phoolan Devi: ये सियासत की इच्छा है कि फूलन देवी जिंदा रहें... ?

Phoolan Devi: फूलन देवी की मौत को 23 साल पूरे हुए हैं. फूलन यानी चंबल में पहली महिला जिसने बंदूक उठाई, एक खूनी बदला लिया. 11 साल जेल में रहीं. फिर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं. फिर एक दिन दिल्ली में माननीय सांसद फूलन देवी की सरेआम बंदूक से हत्या कर दी गई.

Phoolan Devi: ये सियासत की इच्छा है कि फूलन देवी जिंदा रहें... ?

Phoolan Devi: फूलन देवी की मौत को 23 साल पूरे हुए हैं. फूलन यानी चंबल में पहली महिला जिसने बंदूक उठाई, एक खूनी बदला लिया. 11 साल जेल में रहीं. फिर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं. फिर एक दिन दिल्ली में माननीय सांसद फूलन देवी की सरेआम बंदूक से हत्या कर दी गई. आप सोच रहे होंगे कि आज फूलन का जिक्र क्यों?.. 

तो उसकी वजह है कि ये सियासत की इच्छा है कि फूलन देवी ज़िंदा रहें. और ये इच्छा इसलिये है क्योंकि मौत के बाद भी फूलन देवी में बहुत वोट हैं. आइये आपको बताते हैं फूलन देवी को कैसे ज़िंदा किया जा रहा है. फूलन देवी का साइकिल के साथ फोटो अखिलेश यादव ने पोस्ट किया है. लिखा है कि सामाजिक न्याय की प्रतीक फूलन देवी. भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद ने भी फूलन देवी का फोटो पोस्ट किया और लिखा- आत्मसम्मान के लिये विद्रोह की प्रतीक, महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत वीरांगना फूलन देवी.

दुनिया ने जिन्हें चंबल के डाकू या दस्यु कहा है, चंबल ने हमेशा उन्हें बाग़ी कहा. लूटने वाले नहीं, बग़ावत करने वाले. ऐसी ही एक बाग़ी थी फूलन देवी. जिसने कम उम्र में गैंग बनाई. पांच साल बीहड़ों में भटकती रही, और फिर 1981 में चंबल के बेहमई गांव में 20 अगड़ों को एक कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया. अपने अपमान और अपने शोषण का इस नरसंहार से बदला लेकर पूरे देश को हिला दिया.

दो साल पुलिस को दौड़ाने के बाद 1983 में अपनी शर्तों पर सरेंडर किया. और फिर 11 साल की जेल काटकर 1994 में बाहर निकलीं. फूलन के बाहर आते ही समाजवादी पार्टी ने उन्हें अन्याय से लड़ाई की प्रतीक बताकर पेश किया. इसी साल आई बैंडिट क्वीन फिल्म ने इस ब्रांडिंग को मजबूती दी. दो साल बाद 1996 के चुनाव आए, तो मुलायम सिंह ने उन्हें टिकट दे दिया. फूलन मिर्ज़ापुर से जीत गईं, और माननीय सांसद फूलन देवी बन गईं. 99 में दूसरी बार भी जीतीं, इसके बाद फूलन देवी जिस मंच पर जाती थीं, बताती थीं कि बेहमई कांड क्रूरता नहीं थी, बल्कि उसमें पिछडों और वंचितों के प्रतिशोध की आग थी.

लेकिन फूलन देवी का समाजवादी पार्टी से मोहभंग भी हुआ. उन्होंने एक नई 'एकलव्य पार्टी' बनाई. लेकिन कुछ ही दिन हुए थे कि 25 जुलाई 2001 में फूलन देवी की दिल्ली में घर के बाहर सरेआम हत्या कर दी गई. हत्या के पीछे राजनीतिक खींचतान भी तलाशी गई. लेकिन फूलन की हत्या से मुलायम सिंह भी दुखी दिखे. आप मुलायम का संसद में दिया वो भाषण सुनें होंगे, जिसमें वो फूलन को राजकीय सम्मान ना दिये जाने पर बोले थे.

अब हम उस 'क्यों' पर आते हैं कि आज इतने वक्त बाद फूलन की याद क्यों आई? फूलन देवी को वीरांगना, क्रांतिकारी और द रीयल आयरन लेडी बताने वाले बयान अब तक तो नहीं थे, तो अब अचानक क्यों? क्या ये भी यूपी की PDA पॉलिटिक्स का पार्ट तो नहीं?

- फूलन देवी यूपी के निषाद-मल्लाह समाज से आती थीं.- निषाद और मल्लाह यूपी में अति पिछड़ा वर्ग में आते हैं
- यूपी के कुल वोटरों में ओबीसी वर्ग की संख्या 42% है.
- ओबीसी वोटर्स में भी निषाद-मल्लाह वोटर्स 18% हैं
- निषाद-मल्लाह यूपी की 160 विधानसभा सीटों पर असरदार हैं
- 100 सीटों पर निषाद-मल्लाह की संख्या 15 से 70 हज़ार के बीच है.

लोकसभा चुनाव के नतीजों से कई स्तर पर पाया गया है कि समाजवादी पार्टी का PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक फॉर्मूला असरदार रहा है, और यूपी में एक नया जाति समीकरण तैयार हुआ है. ..2027 के लिये इस वोट बैंक पर हर पार्टी की नज़र है. इसीलिये Same Time अखिलेश यादव को भी फूलन देवी याद आई हैं, और भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद को भी. ..और इसीलिये हम कह रहे हैं कि फूलन देवी अभी ज़िंदा हैं.

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