1857 की वह तलवार जिसके डर से भाग खड़े हुए अंग्रेज, कहानी मालवा के शेर बख्तावर सिंह की
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1857 की वह तलवार जिसके डर से भाग खड़े हुए अंग्रेज, कहानी मालवा के शेर बख्तावर सिंह की

अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के विद्रोह में मध्य प्रदेश Madhya Pradesh का भी बड़ा योगदान था. उस वक्त ऐसी कई छोटी-छोटी रियासतें थी जिनके राजाओं और राजकुमारों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया था. महाराणा बख्तावर सिंह maharana bakhtawar singh उन्ही राजाओं में से एक थे. जिन्हें मालवा Malwa का शेर कहा जाता है. बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया और मालवा के लोगों के मन से अंग्रेजों का डर खत्म हो गया था. 

1857 की वह तलवार जिसके डर से भाग खड़े हुए अंग्रेज, कहानी मालवा के शेर बख्तावर सिंह की

इंदौर। 15 अगस्त 15 august को देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा. लेकिन 1947 में मिली आजादी का बिगुल बहुत पहले ही फूंक दिया गया गया था और आजादी की इस लड़ाई में न जाने कितने वीर क्रांतिकारियों ने अपने प्राण देश पर न्योछावर किए तब जाकर हमें यह आजादी मिली थी. अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ 1887 में विद्रोह की शुरुआत हुई थी और इस आंदोलन में देश के कई राजा-राजकुमारों ने भी अपना योगदान दिया था. जो न अंग्रेजों के आगे झुके और न ही स्वाधीनता स्वीकार की बल्कि अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए 1857 के विद्रोह में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. एक ऐसा ही नाम थे महाराणा बख्तावर सिंह, जिन्हें मालवा का शेर कहा जाता था, जिन्होंने मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया था, जिनसे अंग्रेज इतना खोफ खाते थे कि उन्होंने अपने कई नियम तक बदल दिए थे. मालवा malwa में आज भी बख्तावर सिंह bakhtawar singh लोगों के बीच पूजे जाते हैं, हम आपको बख्तावर सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं. 

धार dhar जिले के अमझेरा में था बख्तावर सिंह का राज्य 
धार dhar जिले में आने वाले अमझेरा amjhera कस्बा महाराणा बख्तावर सिंह का राज्य था. जो उस वक्त एक छोटा सा राज्य था. 14 दिसंबर 1923 में बख्तावर सिंह जन्म हुआ था. इनके पिता का नाम अजीत सिंह राठोड़ और माता का नाम महारानी इंद्रकुंवर था. खास बात यह है कि बख्तावर सिंह जब महज सात साल के थे, तभी इनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद महज सात साल की उम्र में ही इन्हें रियासत की बागडोर संभालनी पड़ी. 

अंग्रेजों के खिलाफ बजाया क्रांति का बिगुल 
देश में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियां तेजी से बढ़ रही थी और यह मालवा तक पहुंच गई. बता दें कि मालवा वर्तमान मध्य प्रदेश के इंदौर, उज्जैन, धार, रतलाम सहित कई जिलों में फेला हुआ है. अंग्रेजों की नजर बख्तावर सिंह पर भी थी. लेकिन बख्तावर सिंह अंग्रेंजो की नीतिओं से भलिभाती परिचित थे. अंग्रेजों ने धार जिले के भोपावर में छावनी बना ली.  ऐसे में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा दिया. महाराणा बख्तावर सिंह ने 3 जुलाई 1857 को अमझेरा उनकी सेना ने अंग्रेजों की भोपावर छावनी पर हमलाकर दिया. बख्तावर सिंह का अंग्रेजों पर पहला हमला ही इतना तेज था कि अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई और बख्तावर सिंह की सेना ने पूरी छावनी को तहस नहस कर उसमें आग लगा दी. अंग्रेजों के खिलाफ महाराणा बख्तावर सिंह की यह पहली ललकार थी. 

कई रियासतों को एक्कठा कर अंग्रेजों के खिलाफ किया विद्रोह 
महाराणा बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसा विद्रोह किया कि कई छोटी-छोटी रियासतें उनके साथ आ गई. महू, नीमच, अगर और मंडलेश्वर के सैनिक भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए तैयार हो गए और उनकी इस मुहिम से लोग जुड़ने लगे.10 अक्टूबर 1857 को सरदारपुर और 16 अक्टूबर 1857 को मालपुर-गुजरी छावनियों पर भी कब्जा कर अंग्रेजी सैनिकों को मार गिराया. बख्तावर सिंह की इस जीत से मालवा के लोगों को उत्साह बढ़ गया. कहा जाता है उस वक्त अंग्रेजों ने अपने कई नियम केवल इसलिए बदल दिए थे क्योंकि उन्हें महाराणा बख्तावर सिंह का डर था. 

अंग्रेजों ने बनाई रणनीति 
महाराणा बख्तावर सिंह की वजह से लोगों के मन से अंग्रेजों का डर खत्म हो गया था. ऐसे में अंग्रेज शासक परेशान होने लगे. उन्हें लगा अगर बख्तावर सिंह इसी तरह आगे बढ़ते रहे तो उनके हाथ से मालवा और निमाड़ निकल जाएगा. ऐसे में अंग्रेजों ने बख्तावर सिंह पर आक्रमण करने की योजना बनाई. 31 अक्टूबर 1857 को अंग्रेजों ने धार के किले पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया क्योंकि बख्तावर सिंह अमझेरा में थे. अंग्रेजी शासकों ने सेना और आगे बढ़ने का आदेश दिया था, लेकिन सैनिकों के मन में बख्तावर सिंह का डर इतना था कि अंग्रेजी सेना भोपावर से आगे नहीं बढ़ी और भाग निकली. 

अंग्रेजों ने रचा षंडयंत्र
जब अंग्रेज महाराणा बख्तावर सिंह से सीधी लड़ाई नहीं जीत पाए तो उन्होंने षंडयंत्र का सहारा लिया, लेफ्टिनेंट हचिन्सन ने पूरी बटालियन अमझेरा भेजने की योजना बनाई और इसी बीच कर्नल डूरंड ने अमझेरा रियासत के कुछ प्रभावशाली लोगों को जागीर का लालच देकर कूटनीति से अपनी तरफ मिला लिया और महाराणा बख्तावर सिंह के पास संधिवार्ता के लिए भेज दिया. महाराणा बख्तावर सिंह इस कूटनीतिक चाल में फंस गए और अंग्रेजों से बातचीत के लिए तैयार हो गए. हालांकि उनके कई समर्थकों ने उन्हें धार जाने से रोका. लेकिन वे नहीं माने और अंग्रेजों से बातचीत करने के लिए धार पहुंच गए. धार जाते समय 11 नवम्बर 1857 अंग्रेजों की अश्वारोही टुकड़ी ने इन्हें रोक लिया. अंगरक्षकों के विरोध के बाद भी अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया. बाद में राघोगढ़ वर्तमान देवास के ठाकुर दौलत सिंह ने अंग्रेजों की महू छावनी पर हमला किया और महाराणा बख्तावर सिंह को छुड़ाने का प्रयत्न किया परन्तु वो सफल नहीं हो सके. महू छावनी पर हुए हमले से अंग्रेज घबरा गए और उन्होंने महाराणा को इंदौर जेल भेज दिया और उन्हें तरह तरह की यातनाये दी. 

34 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हुए थे महाराणा बख्तावर सिंह 
अंग्रेजों ने 10 फरवरी 1858 को इंदौर में एक नीम के पेड़ पर महाराणा बख्तावर सिंह फांसी दे दी. कहा जाता है कि महाराणा बख्तावर सिंह का शरीर इतना भारी था कि अंग्रेजी फांसी का फंदा ही टूट गया था. यह भी कहा जाता है कि उस समय अगर किसी को फांसी दी जा रही हो और  फंसी का फंदा टूट जाये तो उस व्यक्ति को माफी दे दी जाती थी. लेकिन अंग्रेजों को बख्तावर सिंह से इतना डर था कि उन्होंने तुरंत मजबूत फंदा बनाकर उन्हें फांसी दे दी. इस तरह मात्र 34 साल की उम्र में वह देश के लिए हंसते हंसते हुए शहीद हो गए थे. 

मालवा के शेर थे महाराणा बख्तावर सिंह 
महाराणा बख्तावर सिंह देश के सच्चे सपूत थे, उन्हें मालवा का शेर कहा जाता है, जिस पेड़ पर उन्हें फांसी दी गई थी, वह पेड़ आज भी इंदौर में मौजूद हैं. वे 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति की ज्वाला बन गए थे, मालवा क्षेत्र में क्रांति का बिगुल फूंकने वाले महाराणा बख्तावर ने कई अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतारा था. वह अपनी आखरी सांस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे लेकिन अंग्रेजों के सामने झुके नहीं. आज भी धार जिले के अमझेरा कस्बे में महाराजा बख्तावर सिंह का राज महल हालांकि इस महल को संरक्षण देने की जरुरत है. मध्य प्रदेश शासन ने अमझेरा के इस महल को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया है, जबकि महल के सामने महाराणा बख्तावर सिंह राठौड़ की प्रतिमा भी लगाई गई है. उनकी वीरता के लिए पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर उन्हें भी याद कर रहा है.

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