जिसने पैदल उत्तर को दक्षिण से जोड़ा था, 3000 किमी चलने वाले पहले संत की कहानी
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जिसने पैदल उत्तर को दक्षिण से जोड़ा था, 3000 किमी चलने वाले पहले संत की कहानी

Adi Shankaracharya: राम मंदिर पर चर्चा में आए शंकराचार्य आखिर कौन होते हैं? यह सवाल हो सकता है लाखों हिंदुओं के मन में आया हो. यह एक ऐसी परंपरा है जो सैकड़ों साल से चली आ रही है. शुरुआत आदि शंकराचार्य ने की थी जिन्होंने पहली बार पूरे देश को एकजुट कर सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया था. 

जिसने पैदल उत्तर को दक्षिण से जोड़ा था, 3000 किमी चलने वाले पहले संत की कहानी

Ram Mandir Shankaracharya: आजकल लंबी पदयात्राएं होती हैं लेकिन इतिहास में पहली पैदल यात्रा एक संत ने की थी. उन्होंने दक्षिण को उत्तर और पूरब को पश्चिम भारत से जोड़ने का काम किया था. एर्नाकुलम के कलाड़ी से वह बद्रीनाथ पैदल आए थे फिर वापस भी गए. यह दूरी 3,000 किमी से भी ज्यादा है और ये कहानी है 8वीं शताब्दी की. कहते हैं कि 12 साल की उम्र उन्होंने घर छोड़ दिया था और 20 साल भारत के चारों कोनों की यात्राएं की. केवल 32 साल की उम्र में उन्होंने शरीर त्याग दिया. ऐसे ओजस्वी और तेजस्वी संत का नाम था आदि शंकराचार्य (Adi Guru Shankaracharya). 

इस समय देश में अयोध्या के राम मंदिर की चर्चा हो रही है. 22 जनवरी को भव्य आयोजन होगा और रामलला अपने महलनुमा मंदिर में विराजमान होंगे. इस चर्चा में पिछले कई दिनों से शंकराचार्य का नाम भी आ रहा है. चारों शंकराचार्यों ने कहा है कि वे 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं होंगे. ये शंकराचार्य कौन हैं जिन्हें करोड़ों हिंदू श्रद्धा भाव से देखते हैं. दरअसल, चार हिंदू मठों के प्रमुख शंकराचार्य कहे जाते हैं. ये चार मठ हैं द्वारका (गुजरात), जोशीमठ (उत्तराखंड), पुरी (ओडिशा) और श्रृंगेरी (कर्नाटक) में. इनकी स्थापना 8वीं शताब्दी के प्रमुख धार्मिक विद्वान और दार्शनिक आदि शंकर ने की थी और अपने शिष्यों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी थी. वही आदि शंकराचार्य कहे जाते हैं. हिंदू धर्म में शंकराचार्य का क्या महत्व है, आइए समझते हैं. 

आगे बढ़ने से पहले जान लीजिए कि द्वारका और श्रृंगेरी मठ के  शंकराचार्यों ने 22 को अयोध्या न आने का कोई कारण नहीं बताया है. हालांकि पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती और ज्योतिर्मठ पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने-अपने कारण गिनाए हैं. 

शंकराचार्य कौन होते हैं?

शंकराचार्य का अर्थ 'शंकर के मार्ग का शिक्षक' होता है. यह एक धार्मिक पदवी होती है. आदि शंकर (788-820 ई.) द्वारा स्थापित चारों मठों के शंकराचार्य उनकी शिक्षाओं को ही प्रचारित करते हैं. इन मठों को आप ज्ञान और शिक्षा का केंद्र कह सकते हैं. आज के समय में इन मठों में धार्मिक तीर्थस्थलों, मंदिरों के साथ-साथ पुस्तकालय और आवास भी शामिल हैं. ये शंकर की परंपरा को संरक्षित करते हुए उसे आगे बढ़ा रहे हैं. 

आदि शंकर कौन थे?

वह पेरियार नदी के किनारे कलाड़ी गांव में पैदा हुए थे. यह आज के समय में केरल के एर्नाकुलम जिले में पड़ता है. उनके बारे में एक कथा काफी लोकप्रिय है. 8 साल की उम्र में उन्होंने मां से संन्यास की इच्छा प्रकट की. मां ने इनकार कर दिया. एक दिन नदी किनारे मगरमच्छ ने शंकर के पैर पकड़ लिए तब बेटे के कहने पर मां ने संन्यासी होने की इजाजत दे दी. पलभर में चमत्कार हुआ और मगरमच्छ ने शंकर के पैर छोड़ दिए.  

शंकर ने अपने जीवन में काफी यात्राएं कीं. मठों की स्थापना की और प्रचलित दार्शनिक परंपराओं को चुनौती भी दी. वह तमिलनाडु में कांची से लेकर असम में कामरूप तक, कश्मीर और हिमालय में केदार, बद्री धाम से लेकर गंगा के तट पर काशी और बंगाल की खाड़ी में पुरी तक गए. उन्होंने देशभर में अद्वैत वेदांत का प्रचार किया. कई ग्रंथ लिखे. 

आत्मा का रहस्य समझाया

वेदांत दर्शन को उपनिषदों का सार कहा जाता है. शंकराचार्य ने कहा कि केवल एक तत्व है और वह ब्रह्म है. उसी को आत्मा भी कहा जाता है. अद्वैत वेदांत में परम सत्ता के रूप में केवल एक तत्व ब्रह्म या आत्मा की सत्ता को स्वीकार किया गया है. शंकराचार्य के अद्वैतवाद से ब्रह्मवाद की स्थापना होती है, जो ब्रह्म को एक और अद्वितीय मानते हैं. शकाराचार्य के वेदांत को अद्वैत वेदांत इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि उनका यह मानना है कि परम तत्व ब्रह्म की सत्ता सभी प्रकार के भेदों से रहित सत्ता है. ऐसे में जब ब्रह्म या आत्मा में किसी प्रकार का भेद नहीं है तो वह निश्चय ही अद्वैत होगा.  

ब्रह्म ही सत्य है

शंकर अद्वैतवादी दार्शनिक थे. उन्होंने भारत से द्वैतवाद का बहिष्कार कर दिया. द्वैतवाद पर आधारित बौद्धमत का पूर्ण रूप से बहिष्कार उनके प्रयत्नों से हुआ. एक लाइन में शंकर के अद्वैत वेदांत को समझें तो 'एक मात्र ब्रह्म ही सत्य है जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म है उससे भिन्न नहीं. ब्रह्म और आत्मा एक हैं. दोनों परमतत्व के पर्याय हैं. जगत प्रपंच माया है.' 

सनातन धर्म में योगदान

शंकराचार्य ऐसे समय में धरती पर आए जब इंसानों की तर्क शक्ति को वैदिक कर्मकांड के आध्यात्मिक महत्व के बारे में समझाया नहीं जा पा रहा था. वैसे हिंदू विचारधारा ने बौद्धमत के ऊपर विजय प्राप्त कर ली थी लेकिन अलग-अलग आस्तिक संप्रदायों के चलते मत भिन्नता थी. हिंदू विचारधारा के लिए यह एक संक्रमण काल था. उस समय प्रतिभाशाली देव स्वरूप शंकराचार्य आए जिन्होंने भूतकाल से संबंध तोड़े बिना नवीन मत के उत्तम प्रभावों को भी स्वीकार किया. (फोटो- lexica AI) 

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