इस्लाम में गैर -मुस्लिम नागरिकों के अधिकार; क्या कहता है कुरआन?
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इस्लाम में गैर -मुस्लिम नागरिकों के अधिकार; क्या कहता है कुरआन?

Islam and Non Muslim Citizens: इस्लाम में इस पर बात पर जोर डाला गया है कि किसी भी गैर-मुस्लिम नागरिक पर जुल्म न किया जाए. अगर कोई शख्स ऐसा करता है तो कयामत के दिन उसकी पकड़ होगी.

इस्लाम में गैर -मुस्लिम नागरिकों के अधिकार; क्या कहता है कुरआन?

Islam and Non Muslim Citizens: इस्लाम धर्म हक की बात करता है. इस्लाम में मां-बाप, भाई-बहन, पड़ोसी, मेहमान और गरीबों के हक के बारे में बताया गया है. इसके साथ ही इस्लाम में गैर-मुस्लिम नागरिकों के हक के बारे में भी बताया गया है. इस्लाम में बताया गया है कि गैर मुस्लिम नागरिकों के जान-माल को नुक्सान न पहुंचाओ. उनकी इज्जत आबरू की हिफाजत करो. इस्लाम में गैर-मुस्लिम नागरिकों पर जुल्म करने से मना किया गया है. उनका हक मारने की मनाही की गई है. 

गैर-मुस्लिम पर जुल्म न करो

इसके अलावा इस्लाम में इस बात की ताकीद की गई है गैर-मुस्लिम नागरिकों पर उनकी ताकत से ज्यादा बोझ न डालो. इस्लाम में गैर-मुस्लिम नागरिकों की कोई भी चीज उनकी रजामंदी के बगैर लेने से मना किया गया है. अगर कोई मुसलमान ऊपर दी गई तमाम बातों में किसी भी बात के खिलाफ काम करता है, तो कयामत के दिन उसकी पकड़ होगी.

गैर-मुस्लिम नागरिक के हक पर हदीस

गैर-मुस्लिम नागरिकों के हक के बारे में बात करते हुए इस्लाम में कहा गया है कि "अल्लाह के रसूल (स.) ने फरमाया: इस्लामी हुकूमत में किसी ऐसे गैर-मुस्लिम नागरिक पर जिसकी जान-माल, इज्जत-आबरू की हिफाजत का मुसलमानों ने समझौता किया है, जो शख्स जुल्म करेगा, या उसका हक मारेगा या उस पर उसकी ताकत से ज्यादा बोझ डालेगा या गैर-मुस्लिम नागरिक की कोई चीज उसकी रजामंदी के बगैर ले लेगा तो अल्लाह की अदालत में दायर होने वाले मुकदमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक की तरफ से वकील बनूंगा."

मुसलमान की हार

खयाल रहे कि इस हदीस का ताल्लुक उस हालत से है, जब किसी देश में इस्लामी हुकूमत हो. हदीस पढ़कर यह समझ में आता है कि कयामत के दिन अगर प्रोफेट मोहम्मद (स.) किसी गैर-मुस्लिम के मुकदमें में उसके वकील बनकर आएं, तो उस मुसलमान की शर्मनाक हार होने से कौन रोक सकता है, जिसके खिलाफ मुकदमा किया गया हो?

अपने मजहब पर चलने की छूट

यह गौरतलब है कि इस्लाम किसी भी गैर-मुस्लिम शख्स को जबरन इस्लाम में दाखिल करने से मना करता है. सिर्फ उसे इस्लाम की दावत देने का हुक्म दिया गया है. किसी को उसकी मर्जी के खिलाफ इस्लाम धर्म अपनाया नहीं जा सकता है. ऐसा करना किसी पर जुल्म करने के बराबर है. इस बारे में कुरान में जिक्र है कि "इस्लाम सभी को अपने मजहब पर चलने की छूट देता है." (लाकुम दीनकुम वलियादीन.)

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