फोटोग्राफी के फील्ड में इस कंपनी का दुनिया में चलता था सिक्का, बदलाव नहीं किया तो हुई कंगाल

कोडक कैमरा एक वक्त में काफी पॉपुलर हुआ करता था, लेकिन फिर एक समय ऐसा आया जब ये कैमरा धीरे-धीरे लोगों की नजरों से दूर हो गया. इसकी वजह जो भी रही हो लेकिन ये कैमरा हमेशा लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है. 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Mar 23, 2023, 05:42 PM IST
  • 2004 में नुकसान के बाद बंद हुई कंपनी
    डिजिटल कैमरे के तौर पर थी पहचान
फोटोग्राफी के फील्ड में इस कंपनी का दुनिया में चलता था सिक्का, बदलाव नहीं किया तो हुई कंगाल

नई दिल्ली: कोडक कैमरा ये नाम 80 और 90 के दशक में काफी पॉपुलर हुआ था. चाहे कोई बर्थडे पार्टी हो या शादी विवाह, हर हाथ में आपको ये कैमरा आसानी से दिख सकता था. लेकिन कहते हैं ना कि वक्त कभी भी एक जैसा नहीं रहता. ऐसे ही धीरे-धीरे अपनी चमक फैलाने वाले कैमरे की इस कंपनी की चमक भी फीकी होती चली गई. विश्व को पहला डिजिटल कैमरा देने वाली ये कंपनी खुद को डिजिटल वर्ल्ड में ढाल नहीं पाई और इसे अंत का सामना करना पड़ा. 

क्या है कोडक कैमरा  
कोडक कैमरे को बनाने वाली कंपनी की शुरुआत साल 1880 में कोडक कंपनी के नाम से हुई थी. लेकिन इस कैमरे को पूरी दुनिया के सामने साल 1888 में जॉर्ज ईस्टमैन ने पेश किया था. उस वक्त ये कैमरा काफी महंगा हुआ करता था.

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यह एक ऐसा कैमरा था जिसमें एक पेपर फिल्म के जरिए एक साथ सौ फोटो खींची जाती थी. कहा जाता है कि इस कैमरे के मार्केट में आने पर ईस्टमैन ने नारा दिया था 'आप बटन दबाइए, बाकी हम करेंगे'.

बता दें कि 1940 के दशक में 35mm वाले इस कैमरे का फिल्मों में काफी इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा दूसरे विश्व युद्ध में भी पत्रकारों ने इस कैमरे से लोगों को युद्ध की झलक दिखाई थी. हालांकि कैमरा पेश करने के कुछ ही दिनों बात ईस्टमैन ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया था. 

डिजिटल कैमरे के रूप में हुई पहचान 
19वीं सदी में इस कैमरे की कीमत काफी ज्यादा होने की वजह से यह बहुत कम लोगों तक ही पहुंच पाया था, लेकिन फिर साल 1975 में इसी कंपनी के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर स्टीवन सैसन ने एक डिजिटल कैमरे का आविष्कार किया.

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ये कैमरा जॉर्ज ईस्टमैन के पेश किए गए कैमरे से काफी अलग था. इसमें पेपर फिल्म का इस्तेमाल नहीं किया जाता था. बल्कि इस कैमरे द्वारा खींची गई तस्वीरों को कैसेट्स में सेव किया जाता था. जिसे बाद में टीवी पर देखा जा सकता था. 

इस कैमरे को आम तौर पर पहले डिजिटल स्टैन स्नैपर के रूप में पहचाना जाता था. साथ ही इसमें Charge Coupled Device (CCD) इमेज सेंसर का भी इस्तेमाल किया गया था. यह कैमरा वजन में करीब चार किलोग्राम का था और ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींची जाती थी. इस कैमरे का रिजोल्यूशन 0.01 मेगा पिक्सेल था. बाद में कंपनी ने 1986 में 1.4 मेगा पिक्सल का कैमरा सेंसर बनाया था. बता दें कि 1975 में पहली डिजिटल तस्वीर को रिकॉर्ड करने में इस कैमरा को 23 सेकंड का समय लगा था. 

वक्त के साथ नहीं बदल पाई कोडक 
कहते हैं कि वक्त के साथ खुद को बदलना जरूरी होता है. बदलाव हर किसी के लिए जरूरी है. लेकिन बदलाव की ये नीति कोडक को रास नहीं आई और उसने बदलाव को ठुकरा दिया. यही वो कारण है कि धीरे-धीरे कोडक भी लोगों की जिंदगी से गायब होती गई. वक्त के साथ-साथ डिजिटल कैमरे का चलन बढ़ने लगा. मार्केट डिमांड के कारण कोडक को टक्कर देने के लिए कई सारी कैमरे बनाने वाली कंपनिया सामने आई. इस दौरान कंपनी को लगा कि डिजिटल कैमरे को और बढ़ावा देने पर कंपनी को उन फैक्ट्रियों को बंद करना पड़ेगा, जो कैमरे की रील और प्रिंटिंग शीट का निर्माण करती हैं. कह सकते हैं कि कोडक ने लॉन्ग टर्म फायदे को छोड़कर शॉर्ट टर्म फायदे को चुना.

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उस दौरान कोडक ने अपनी नीति में परिवर्तन ना करके इसके प्रचार प्रसार का अभियान शुरू कर दिया. ये कंपनी की सबसे बड़ी भूल थी. एक ओर ये कंपनी अपना प्रचार प्रसार करने में पैसा गंवा रही थी तो वही बाकी डिजिटल कैमरे की कंपनी अपने कैमरे बेचकर पैसा कमा रही थी. जब तक कंपनी ने डिजिटल कैमरे बनाने शुरू किए, तब तक वह मार्केट में बाकी कंपनियों द्वारा पूरी तरह किनारे की जा चुकी थी. 

कोडक कंपनी का अंत 
इस तरह कंपनी हर साल नुकसान झेलती रही और 2004 में काफी नुकसान झेलने के बाद कंपनी ने पारंपरिक फिल्म कैमरे बनाने बंद कर दिए. वहीं साल 2011 तक अमेरिकी शेयर बाजार में कंपनी के शेयर कंपनी के इतिहास में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे.

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