Atal Bihari Vajpayee: जब अटल-आडवाणी के बीच हुआ मतभेद, पढ़िए अनसुने किस्से

अटल बिहारी वाजपेयी ने सबसे पहले 1996 में 13 दिन, फिर 1998 में 13 महीने और उसके बाद 1999 में 5 साल तक सरकार चलाई. आपको अटल जी से जुड़े उन किस्सों को जानना चाहिए, जिसे आपने कहीं नहीं सुना होगा.

Written by - Prabhat Thakur | Last Updated : Aug 16, 2021, 09:27 AM IST
  • अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल है एक मिसाल
  • पूर्व प्रधानमंत्री के अनोखे-अद्भुत व्यक्तित्व को जानिए
Atal Bihari Vajpayee: जब अटल-आडवाणी के बीच हुआ मतभेद, पढ़िए अनसुने किस्से

नई दिल्ली: 13 दिन के प्रधानमंत्री, 13 महीने के प्रधानमंत्री और फिर 63 महीने तक सत्ता का शिखर क्या राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ इसी पहचान के साथ दर्ज है? बिलकुल नहीं, क्योंकि इस जननायक ने न सिर्फ राजनितिक दलों को ही  नहीं बल्कि जनता का दिल जीता है जो की भारतीय राजनीति  में कम ही देखने को मिलता है.

अटल बिहारी वाजपेयी जैसी शख्सियत भारतीय राजनीति का वो सितारा जो कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वाजपेयी जी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्सों के बारे में जानना चाहिए. इन्हीं किस्सों से ये समझ आ जाएगा कि वाजपेयी जी औरों से अलग कैसे हैं.

जब अटल आडवाणी का हुआ था मतभेद

भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने  एक लेख में जिक्र किया है कि अटल बिहारी वाजपेयी और उनके बीच नरेंद्र मोदी को लेकर मतभेद हो गए थे. आडवाणी ने कहा कि गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा के बाद तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी से इस्तीफा मांगने को लेकर तत्कालीन पीएम वाजपेयी से उनका मतभेद हो गया था.

'अटल स्मृति अंक' में अपने लेख में उन्होंने लिखा कि जब गोधरा में कार सेवकों को जिंदा जलाए जाने के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे, तब विपक्षी दलों ने नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांगा था. उस वक्त एनडीए और बीजेपी में कुछ लोग सोचने लगे थे कि मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए.

'मेरी राय में अपराधी नहीं थे नरेंद्र मोदी'

आडवाणी लिखते हैं कि मेरी राय में नरेंद्र मोदी अपराधी नहीं थे, बल्कि वे खुद राजनीति का शिकार हो गए थे. मैंने अनुभव किया कि एक साल से भी कम समय पहले सीएम बने मोदी को कठिन साम्प्रदायिक स्थिति का शिकार बनाना अन्याय होगा. आडवाणी ने आगे लिखा कि मोदी से इस्तीफा मांगने अटलजी पर लगातार दबाव बढ़ रहा था.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जसवंत ने इस मुद्दा को उछाला और अटलजी से पूछा कि आप क्या सोचते हैं? इसपर अटल जी ने कहा कि कम से कम इस्तीफे की पेशकश तो करते, जिसपर आडवाणी ने कहा कि तब मैंने बोला कि अगर उनके इस्तीफे से गुजरात के हालात में कुछ सुधार होता है, तो उनसे इस्तीफा मांगा जाए, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इसमें कुछ बदलाव होगा.

उन्होंने इस बाबत मोदी से भी बात की और वो इस प्रस्ताव को मान गए. लेकिन, सबके सामने मोदी ने इस्तीफे की बात कही तो सबने कहा कि इस्तीफा मत दो और इस तरह से यह मामला सुलझ गया. लेकिन, इस दौरान अटलजी से आडवाणी का मतभेद हो गया था.

राम मंदिर को लेकर भी अटलजी से मनमुटाव

इतना ही नहीं आडवाणी ने कहा कि एक बार राम मंदिर को लेकर भी अटलजी से मनमुटाव हुआ था. अयोध्या आंदोलन से भाजपा के जुड़ने पर अटलजी को आपत्ति थी. लेकिन, बाद में सामूहिक निर्णय के बाद अटलजी मान गए.

इस तरह से दो मामलों पर दो बार अटल और आडवाणी के बीच मतभेद हुआ था. वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत मिश्रा एक इंटरव्यू में इसी वाक्य का जिक्र करते हुए बताते है की इस बात को लेकर वाजपेयी जी के घर एक मीटिंग हुई जिसमें उन्होंने ने कहा कि 'ध्यान रहे आप अयोध्या जा रहे है लंका नहीं'

कथा वाचक दादा से सीखा कविता का क, ख

अटल जी जितने शानदार राजनेता थे उतने ही शानदार कवि भी रहे, लेकिन उनको इस धार में लेन का पूरा श्रेय उनके दादा पंडित श्यामलाल जी को जाता है, जिनसे उन्हें कविता की प्रेरणा मिली. यूं तो अटल जी के पिता श्री कृष्ण बिहारी जी का अंदाज भी शायराना था लेकिन मुख्य धार में उनके दादा की प्रेरणा लेकर आई.

नटखट अटल

यूं तो अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में हुआ था, लेकिन आगरा के बटेश्वर से उनका पुराना नाता रहा क्योंकि अटल जी का मूल निवास आगरा का बटेश्वर ही था. उनके दादा यही रहा करते थे औरबचपन के कुछ वर्ष भी अटल जी के यहीं बीते.

एक घटना को याद कर अटल जी के भांजे "विश्वनाथ" बताते हैं कि अटल जी को यमुना नदी में तैराकी और कबड्डी खेलने का शौक था. एक बार वो इसी तैराकी के चक्कर में डूबने से बच गए, क्योंकि सही समय पर उनके दोस्तों ने उन्हें बचा लिया था. जब भारत छोरो आंदोलन में अटल जी ने खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था, तो उन्होंने इसी स्थान पे शरण ली और आंदोलन में हिस्सा लिया.

सरल सहज अटल

अटल जी के सहजता के किस्से हर जगह मशहूर हैं कि वो जिससे भी मिलते थे, बिल्कुल एक आम इंसान की तरह.. लेकिन ऐसे ही कुछ किस्से जो ये बताते है की अटल वाकई अटल थे.

उनके साथ उनके साए की तरह रहने वाले, उनके खानसामा कहिये, चुनाव प्रबंधक कहिये या निजी सुरक्षा कर्मी समझिये.. शिवकुमार बताते हैं कि एक बार अटल जी बेंगलुरु से आने वाले थे. और वो उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर लेने जाने वाले थे. तभी उनके पास जगदीश माथुर आएं और कहने लगे कि चलो फिल्म देखने, रीगल सिनेमा चलें.

शिवकुमार ने नकारते हुए कहा  की मुझे वाजपेयी जी को लेने जाना है. हालांकि आम तौर पर पहले बेंगलुरु का हवाई जहाज देर से आता था. फिर भी शिवकुमार ने सिनेमा देखने जाने के लिए मना किया लेकिन जगदीश माथुर नहीं माने वो उनको अपने साथ ले गए फिल्म खत्म करने के बाद का जिक्र कर शिवकुमार बताते हैं कि जैसे ही एयरपोर्ट गए, तो पता चला बेंगलुरु का विमान कब का पहुंच गया.

शिवकुमार अपने सारे देवताओ को याद कर उस समय 1 फिरोजशाह रोड जो सरकारी निवास था. वहां पहुंचे तो देखा तो अटल जी लॉन में टहल रहे थे. उन्होंने जैसे ही मुझे देखा, तो बोले 'आप कहां चले गए थे?' तो मैंने कहा सिनेमा  देखने. इस पर वाजपेयी जी ने सरलता पूर्वक कहा कि अरे भाई कल चलते हम भी आपके साथ चलते. खैर मुझे एक मीटिंग में माता विजया राजे जी के यहां जाना है. शिवकुमार ने बताया कि मैंने उस वक्त महसूस किया की इन जैसा महान व्यक्ति शायद ही होगा जो इतनी सरलतापूर्वक बातें कर रहा है.

इसी कड़ी में दूसरा किस्सा

वरिष्ठ पत्रकार HK दुआ अपने एक बात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक दिन वो अपने स्कूटर से प्रेस क्लब जा रहे थे. तो उन्होंने देखा की वाजपेयी जी अपने सरकारी आवास पर खड़े वाहन का इंतजार कर रहे थे. इत्तफाकन वाजपेयी जी ही इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित करने वाले थे. दुआ जी ने अपना स्कूटर रोक कर अटल जी को ले जाने का आह्वान किया. तो अटल जी तुरंत स्कूटर पर बैठ कर प्रेस क्लब पहुंचे.

वहां मौजूद जगदीश माथुर ने जब ये देखा, तो उन्होंने दुआ जी को कहा कि कल अखबार की हेडलाइंस ये होगी. vajpai takes a ride on hk dua scooter जिसपर वाजपेयी जी ने उतरते हुए तपाक से कहा HK Dua takes bajpai for a ride इस सादगी भरे अंदाज को ही लोगों से अलग बनाया जाता है.

राजनितिक तिकड़म और भावुक अटल

1999 का तिकड़म कुछ ऐसा है कि वो 21-22 अप्रैल की रात थी. देर रात को वाजपेयी सरकार के रक्षा मंत्री और एनडीए के संयोजक जॉर्ज फर्नांडीज ने लालकृष्ण आडवाणी को फोन किया. उन्होंने कहा- 'लाल जी, मेरे पास आपके लिए एक अच्छी खबर है. सोनिया गांधी सरकार नहीं बना सकती.'

आडवाणी ने पूछा- किस आधार पर आप ऐसा कह रहे हैं?

जॉर्ज ने कहा- 'बहुत जल्दी आप जान जाएंगे. दूसरे पक्ष का एक खास व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है. परंतु ये मुलाकात आपके या मेरे घर पर नहीं हो सकती. हम लोग सुजान सिंह पार्क में जया जेटली के घर पर मिलेंगे. आप अपनी कार से मत आइएगा क्योंकि उससे सुरक्षा दस्ता आपके साथ होगा. जया आपको लेने आएंगी और आप उनकी कार में आएं.'

आडवाणी अपनी कार छोड़कर जया की कार में सवार होकर किसी को बताए बगैर उनके घर पहुंचे. जो शख्स वहां बैठा मिला, उसे देखकर आडवाणी भी चौंक गए. वो थे समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav)..

इस वाकये का जिक्र करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने अपने किताब 'MY COUNTRY, MY LIFE' में लिखा है- जॉर्ज और मुलायम दोनों समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं और लोहिया के अनुयायी रहे हैं. एक लंबे समय से दोस्त रहे और वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद अलग-अलग रास्तों पर जाने के बाद भी उनकी दोस्ती बनी हुई थी.

आडवाणी ने ये भी बताया कि कांग्रेस के धुर विरोधी जॉर्ज ने मुझसे कहा- 'लालजी, मेरे दोस्त का ये पक्का वादा है कि उनकी पार्टी के 20 सांसद किसी भी हालत में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने में सहयोग नहीं देंगे. मैं इन्हें अपने साथ लाया हूं ताकि आपको इस बात पर पूरा भरोसा हो सके.'

आडवाणी ने आगे लिखा है कि उनके सामने भी मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी को समर्थन नहीं देने का अपना वादा फिर से दोहराया. लेकिन ये भी कहा- 'आडवाणी जी मेरी एक शर्त है. इससे पहले मैं घोषणा करूं कि सरकार बनाने में हम सोनिया के साथ नहीं हैं, मैं आपसे एक वादा चाहता हूं कि उस हालत में एनडीए फिर से सरकार बनाने की कोई कोशिश नहीं करेगा. कोई दावा पेश नहीं करेगा. मैं चाहता हूं कि दोबारा चुनाव हो.'

आडवाणी ने मुलायम सिंह यादव को भरोसा देते हुए कहा- 'मुलायम सिंह जी, इस साहसिक निर्णय के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं. जहां तक दूसरी बात का सवाल है, तो एनडीए में भी लोगों का विचार यही है कि हमें सरकार बनाने के लिए दोबारा दावा पेश नहीं करना चाहिए. हमें मध्यावधि चुनाव का सामना करना चाहिए.'

कम ही लोगों के ये मालूम होगा की आज के भाजपा के वर्तमान नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन सर्कार को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी जिसमें जयललिता की भिमुख्य भूमिका रही. ये पल शायद अटल जी के जीवन का सबसे दुखद पल था और शायद इसलिए इस फैसले के बाद वो अपने  आंख के पानी को भी नहीं रुक पाए. हालांकि राजनीती का दस्तूर कुछ ऐसा रहा, लेकिन अटल की राजनीती भी अटल थी जिसकी मिशालें आज भी दी जाती है.

इसी क्रम में उनकी बोली हुई कुछ पंक्तिया जो आज भी उनके अमर होने का एहसास दिलाती है.

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

ये थी अटल जी के जीवन की कुछ अटल बाते जो उनके व्यक्तित्व को महान बनती है.

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