विधानमंडलों को अपराधियों का अड्डा बनने से रोके संसद और चुनाव आयोगः कोर्ट
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विधानमंडलों को अपराधियों का अड्डा बनने से रोके संसद और चुनाव आयोगः कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए सख्त लेहजे में कहा है कि जनता कानून से भरोसा उठ रहा है; लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है ये स्थिति. 

 

अलामती तस्वीर

लखनऊः राजनीति के अपराधिकरण को लेकर सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद सख्त टिप्पणी की है. हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने संसद और चुनाव आयोग से कहा है कि अपराधियों को मुल्क की सियासत से दूर रखने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं. इसके साथ ही बेंच ने कहा है कि राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच बढ़ते नापाक गठजोड़ को भी तोड़ा जाए. न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की बेंच ने बसपा सांसद अतुल कुमार सिंह उर्फ अतुल राय की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है.
अदालत ने कहा है कि यह संसद की जिम्मेदारी है कि वह लोकतंत्र को बचाने के लिए अपराधियों को सियासत और विधायिका में पहुंचने से रोकने के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति दिखाए और यह तय करे कि मुल्क लोकतांत्रिक सिद्धांतों और कानून के शासन के हिसाब से चलता रहे. 

बसपा नेता की अर्जी खारिज करते हुए कोर्ट ने की ये टिप्पणी 
अदालत ने कहा कि राय के खिलाफ 23 मामलों के क्रिमिनल हिस्ट्री, आरोपी की ताकत, सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना को देखते हुए उसे इस स्तर पर जमानत देने का कोई आधार नहीं मिला. गुजिश्ता साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के बाहर एक लड़की और उसके गवाह को खुदकुशी के लिए उकसाने के इल्जाम में लखनऊ में हजरतगंज पुलिस ने राय के खिलाफ मामला दर्ज किया था. 

सुप्रीम कोर्ट की चिंता को नजरअंदाज किया गया 
केस की सुनवाई के दौरान बेंच को पता चला कि 2004 में 24 फीसदी लोकसभा सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे, जो 2009 के चुनावों में बढ़कर 30 फीसदी हो गए. 2014 में यह बढ़कर 34 फीसदी हो गया और 2019 में लोकसभा के लिए चुने गए 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे. पीठ ने कहा कि इस तथ्य के बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट ने सियासत में अपराधियों के प्रवेश रोकने और चुनावी सुधारों की जरूरतों पर ध्यान दिया है, संसद और चुनाव आयोग ने भारतीय लोकतंत्र को अपराधियों, ठगों और कानून के हाथों में जाने से बचाने के लिए माकूल इंतजाम नहीं किए हैं.

जम्हूरी निजाम के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है 
अदालत ने कहा कि कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि मौजूदा हिन्दुस्तान की सियासत अपराध, पहचान, संरक्षण, ताकत और धन के नेटवर्क में उलझ गई है. अपराध और राजनीति के बीच गठजोड़ कानून के शासन पर आधारित जम्हूरी निजाम और हुकूमत के लिए एक गंभीर खतरा है. संसद के चुनाव और राज्य विधायिका और यहां तक कि स्थानीय निकायों और पंचायतों के लिए भी बहुत गंभीर मसले पैदा हो गए हैं. इसमें कहा गया है कि संगठित अपराध, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच एक नापाक गठबंधन है.

न्याय व्यवस्था से घट रहा है लोगों का भरोसा 
अदालत ने कहा कि इस घटना ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों और प्रशासन की विश्वसनीयता, प्रभावशीलता और निष्पक्षता को खत्म कर दिया है. अदालत ने कहा कि राय जैसे आरोपी ने गवाहों को जीत लिया, जांच को मुतासिर किया और अपने पैसे, ताकत और सियासी रसूख का इस्तेमाल करके सबूतों से छेड़छाड़ की. इसी का नतीजा है कि देश की हुकूमत और न्याय व्यवस्था से लोगों का भरोसा घट रहा है.

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