Chhoti Diwali 2022: एक ही दिन मनेंगी बड़ी और छोटी दीवाली, जानिए नरक चतुर्दशी की कथा
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Chhoti Diwali 2022: एक ही दिन मनेंगी बड़ी और छोटी दीवाली, जानिए नरक चतुर्दशी की कथा

Chhoti Diwali 2022: दिवाली के एक दिन पहले इसे रूप चौदस और नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है. इस दिन सुबह-सवेरे उबटन लगा कर नहाना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद घर में पांच दीये जलाए जाते हैं. 

Chhoti Diwali 2022: एक ही दिन मनेंगी बड़ी और छोटी दीवाली, जानिए नरक चतुर्दशी की कथा

पटनाः Chhoti Diwali 2022: दीपावली के पांच त्योहारों में दूसरा दिन नरक चतुर्दशी का दिन होता है. इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं. दरअसल धनतेरस से दीपक जलाने की परंपरा शुरू हो जाती है. इसके बाद छोटी दिवाली को भी पांच, 11 या 21 दीपक जलाए जाते हैं. दीपों की सीमित संख्या के कारण यह पर्व छोटी दिवाली कहलाता है. दीपावली सिर्फ भौतिक धन-संपदा का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सच्चे धन की प्राप्ति का समय भी है. सेहत और शारीरिक सौंदर्य भी एक तरीके का धन है. इसलिए दीपावली को आरोग्य धन के पर्व के रूप में जानते हैं. आरोग्य के पर्व का दूसरा दिन रूप व लावण्य का दिन होता है. इसलिए इस दिन कई स्थानों पर तेल-उबटन आदि लगाने के बाद स्नान का चलन भी है. इस बार छोटी और बड़ी दिवाली दोनों एक ही दिन हैं.

इस तरह जलाते हैं पांच दीपक
दिवाली के एक दिन पहले इसे रूप चौदस और नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है. इस दिन सुबह-सवेरे उबटन लगा कर नहाना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद घर में पांच दीये जलाए जाते हैं. एक दीया घर के मंदिर में, दूसरा रसोई में, तीसरा पीने के पानी के पास, चौथा पीपल के पेड़ के नीचे और पांचवा दीया घर के मुख्य द्वार पर. पांचवां दीपक यमराज के नाम होता है. यह दीप अकाल मृत्यु और बीमारियों से मुक्ति देने वाला होता है. 

श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का वध
द्वापर युग में एक असुर नरकासुर ने बहुत उत्पात मचाया था. उसकी राजधानी प्रागज्य़ोतिषपुर में थी. उसने 16 हजार विवाहित स्त्रियों का अपहरण कर लिया और स्वर्ग पर अधिकार की ओर बढ़ा. युद्ध में देवताओं को हराकर वह देव माता अदिति के कुंडल, वरुण देव का छत्र और देवमणि छीन ले गया था. इससे दुखी देवराज इंद्र श्रीकृष्ण के पास आए और प्रार्थना करने लगे कि प्रभु, देवी-देवताओं और मनुष्य जाति को नरकासुर के अत्याचारों से बचा लें. 

सत्यभामा बनी थीं श्रीकृष्ण की सारथी
इस पर श्रीकृष्ण ने सहायता का वचन दिया और पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर जा पहुंचे. दरअसल नरकासुर को स्त्री के हाथों ही मरने का श्राप मिला था. श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि में पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बनाया और उनकी सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर दिया. इसके बाद 16 हजार स्त्रियों के सामने जीवन निर्वाह का संकट आ गया. तब श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह कर लिया. नरकासुर के वध के बाद पृथ्वी व स्वर्ग लोक में शांति स्थापना के लिए दीप जलाए गए. कार्तिक चतुर्दशी का पर्व तभी से लोक परंपरा का हिस्सा बन गया.

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