Kargil Ke Hero: '17,000 फीट की चढ़ाई, ताबड़तोड़ फायरिंग, गोलियों से छलनी होने के बाद भी किया बटालिक सेक्टर की चोटी पर कब्जा
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Kargil Ke Hero: '17,000 फीट की चढ़ाई, ताबड़तोड़ फायरिंग, गोलियों से छलनी होने के बाद भी किया बटालिक सेक्टर की चोटी पर कब्जा

Kargil Ke Hero: भोजपुर जिले संदेश प्रखंड अंतर्गत पनपुरा गांव निवासी स्व. विद्यानंद सिंह ने कारगिल युद्ध के दौरान बहादुरी से संघर्ष करते हुए भारत माता की चरणों में अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

कारगिल के हीरो

भोजपुर: Kargil Ke Hero: भोजपुर जिले में शहादत की लंबी परंपरा रही है. कारगिल शहीद विद्यानंद सिंह इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है. जिले के संदेश प्रखंड अंतर्गत पनपुरा गांव निवासी स्व. विद्यानंद सिंह बिहार रेजिमेंट में लांस नायक के पद पर कार्यरत थे. 33 वर्ष की अल्पायु में ही देश के दुश्मनों के साथ बहादुरी से संघर्ष करते हुए भारत माता की चरणों में अपने प्राण न्योछावर कर जिले में शहादत की परंपरा को एक और नई ऊंचाई प्रदान की है. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विद्यानंद सिंह ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से बहादुरी से लड़ाई लड़ी और उनके सीने पर छह से अधिक गोलियां लगी.

विद्यानंद सिंह उस सैन्य टुकड़ी का हिस्सा थे जिसे बटालिक सेक्टर की चोटी पर पुनः कब्जा करने का काम सौंपा गया था. कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की जीत का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है. इस दिन देश अपने उन बहादुर सैनिकों को याद करता है जिन्होंने 1999 के संघर्ष के दौरान असाधारण वीरता दिखाई और महान बलिदान दिए. ऐसे ही एक बहादुर सैनिक थे बिहार रेजीमेंट के लांस नायक विद्यानंद सिंह, जिन्होंने 9 जून, 1999 को देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी. कारगिल युद्ध के दौरान कारगिल के बटालिक सेक्टर में एक रणनीतिक चोटी पर फिर से कब्जा करते समय वे घायल हो गए थे.

 विद्यानंद ने घुसपैठियों से बहादुरी से लड़ाई लड़ी

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विद्यानंद सिंह ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से बहादुरी से लड़ाई लड़ी और अपने सीने पर छह से ज्यादा गोलियां खाईं. वे उस सैन्य टुकड़ी का हिस्सा थे जिसे कारगिल के द्रास से लगी सीमा पर 17,000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित बटालिक सेक्टर की चोटी पर फिर से कब्जा करने के लिए भेजा गया था. बटालिक सेक्टर भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां से गुज़रने वाला राजमार्ग पाकिस्तान के नियंत्रण में था. भारतीय सेना ने 6 जून 1999 को पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया और 9 जून की रात को चोटी पर पहुंच गई.

17,000 फीट की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भारतीय सेना को पाकिस्तानी सैनिकों से भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. जिन्होंने एक बंकर पर कब्जा कर लिया था. हालांकि, विद्यानंद सिंह ने पाकिस्तानी सैनिकों के साथ हाथापाई की और इस प्रक्रिया में उन्हें कई गोलियां लगीं और उनके कई साथी भी शहीद हो गए. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने तब तक लड़ाई जारी रखी जब तक कि सेना ने चोटी पर कब्जा नहीं कर लिया, लेकिन मदद पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया था.

शहीद विद्यानन्द सिंह का जन्म भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के पनपुरा गांव में हुआ था. उनके परिवार के सदस्यों में पत्नी पार्वती कुंअर, दो बेटे तथा तीन बेटियां अपने पिता के सपनों को आकार देने में लगे हैं. स्व.सिंह के मरणोपरांत केन्द्र व राज्य सरकार से 28 लाख रुपये की सहायता भी मिल चुकी है. केन्द्र सरकार के सहयोग से पीड़ित परिवार को हजारीबाग में पेट्रोल पंप भी दिया जा चुका है.

इनपुट- मनीष कुमार सिंह

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