पुष्कर सिंह धामी के शपथ के साथ टूटेगा देवभूमि का 22 साल का मिथक, हारकर भी बने बाजीगर
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पुष्कर सिंह धामी के शपथ के साथ टूटेगा देवभूमि का 22 साल का मिथक, हारकर भी बने बाजीगर

उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सत्तासीन होने का इतिहास रचने वाली भाजपा के अगुवा पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हारने के बावजूद एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर बाजीगर साबित होने जा रहें हैं. 23 मार्च को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ के साथ ही उत्तराखंड में एक और मिथक भी टूटेगा.

पुष्कर सिंह धामी  के शपथ के साथ टूटेगा देवभूमि का 22 साल का मिथक, हारकर भी बने बाजीगर

देहरादून: उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सत्तासीन होने का इतिहास रचने वाली भाजपा के अगुवा पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हारने के बावजूद एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर बाजीगर साबित होने जा रहें हैं. बुधवार को पुष्कर सिंह धामी दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. इस शपथ के साथ ही 22 साल पहले अस्तित्व में आए उत्तराखंड में एक और मिथक भी  टूटेगा. मिथक यह था कि उत्तराखंड की सियासत में कोई भी मुख्यमंत्री लगातार दो बार सत्तासीन नहीं रहा.   

22 साल में उत्तराखंड में हुए 11 मुख्यमंत्री 
स्थापना के 22 साल के इस सफर में उत्तराखंड ने कई राजनीतिक अस्ठिरता देखी है. उत्तराखंड में इन दो दशकों में 11 मुख्यमंत्रियों का शासन देखा. इसमें भाजपा ने सात, तो वहीं कांग्रेस पार्टी के तीन मुख्यमंत्री हुए. हालांकि, भाजपा शासन के पिछले पांच साल के कार्यकाल में पहली बार उत्तराखंड में तीन-तीन मुख्यमंत्री मिले. सबसे खास बात यह है कि सभी मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ कांग्रेस के पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी ही हैं, जिन्होनें अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. 

पूर्व सैनिक के बेटे ने लड़ी चुनौतियों की लड़ाई 
पिथौरागढ के सीमांत क्षेत्र कनालीछीना में एक पूर्व सैनिक के घर में पैदा हुए धामी की कर्मभूमि खटीमा ही रही. धामी ने जब पिछले साल जुलाई में कार्यभार संभाला था, तब वह प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे. उनके सामने कोरोना महामारी और आपदाओं के साथ ही नजदीक आते विधानसभा चुनाव जैसी कई चुनौतियां भी थीं. इन सभी आपदाओं से निपटने और सत्ता में खुद को दोबारा काबीज करने की तैयारियों के लिए मात्र छह महीने थे. कोविड के चलते पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था, तीर्थ पुरोहितों का चारधाम बोर्ड को लेकर आंदोलन और कोविड फर्जी जांच घोटाला जैसी चुनौतियां भी उनके सामने थीं. उन्होंने कई आर्थिक पैकेजों की घोषणा और चारधाम बोर्ड भंग कर जीत हासिल की और विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के हाथ से मुद्दे छीन लिए.

धामी को मिला पार्टी हाईकमान का पूरा साथ 
पिछले साल जुलाई में धामी को विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही प्रदेश की बागडोर सौंपी गयी थी. पार्टी नेतृत्व के भरोसे पर वह खरे उतरे. हाल में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 70 में से 47 सीटें जीतकर दो तिहाई से अधिक बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता प्राप्त की. हालांकि, लगातार तीसरी बार खटीमा से विधायक बनने का प्रयास कर रहे धामी कांग्रेस के अपने प्रतिद्वंदी भुवन चंद्र कापड़ी से 6500 वोटों के अंतर से हार गए. लेकिन अपनी कार्यशैली और चुनौतियों को पार करने की कार्यकुशलता के कारण ही संभवत: भाजपा हाईकमान ने खटीमा सीट पर उनकी हार के बावजूद लंबे समय के लिए धामी पर ही भरोसा जताया.

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