क्या विरोधी पार्टियों ने ढूंढ लिया बीजेपी को हराने का फार्मूला?
राजनीतिक पंडितों के मुताबिक बिहार में अगड़े-पिछड़ों का मुद्दा उछलने और यूपी में रामचरितमानस (Ramcharitmanas) पर समाजवादी पार्टी की ओर से रोजाना बयान दिए जाने के पीछे यही रणनीति अपनाई जा रही है. इसके जरिए हिंदू समाज में बिखराव करके दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को दूसरी जातियों से भिड़ाने की कोशिश है, जिससे अगले आम चुनाव में बीजेपी को हिंदुओं की एकजुट शक्ति का फायदा न मिल सके. इसी सोची समझी रणनीति के तहत बिहार में जातियों गणना करवाई जा रही है, जिसके नतीजे सामने आने पर दलितों-पिछड़ों को ज्यादा हक देने के नाम पर हिंदू समाज को एकजुट होने से रोका जा सके.
'स्वामी प्रसाद ने फिर बोला रामचरितमानस पर हमला'
बिहार वाली यही रणनीति यूपी में भी अमल में लाई जा रही है. यूपी में एसपी के बड़े नेता स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) रोजाना हिंदुओं के बड़े ग्रंथ श्रीरामचरितमानस (Ramcharitmanas) की आलोचना कर रहे हैं. जिसका पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अपरोक्ष रूप से समर्थन किया है. अब मौर्य ने एक बार फिर मोहन भागवत के बहाने ब्राह्मणों के खिलाफ बयान दिया है. इस बयान में उन्होंने केंद्र सरकार पर रामचरितमानस को संशोधित करवाकर दोबारा से लिखवाने की मांग की है.
मौर्य (Swami Prasad Maurya) ने ट्वीट करके कहा, 'जाति-व्यवस्था पंडितो (ब्राह्मणों) ने बनाई है, यह कहकर RSS प्रमुख श्री भागवत ने धर्म की आड़ में महिलाओं, आदिवासियों, दलितों व पिछड़ो को गाली देने वाले तथाकथित धर्म के ठेकेदारों व ढोंगियों की कलई खोल दी. कम से कम अब तो रामचरित्र मानस से आपत्तिजनक टिप्पणी हटाने के लिये आगे आएं.'
'अपमानित करने वाली टिप्पणियों को हटवाएं मोहन भागवत'
स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने कहा, 'यदि मोहन भागवत का यह बयान मजबूरी का नहीं है तो साहस दिखाते हुए केंद्र सरकार को कहकर, रामचरितमानस से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर नीच, अधम कहने तथा महिलाओं, आदिवासियों, दलितों व पिछड़ों को प्रताड़ित, अपमानित करने वाली टिप्पणियों को हटवायें. मात्र बयान देकर लीपापोती करने से बात बनने वाली नही है.'
अगले आम चुनाव तक चलता रहेगा विरोध का ये दौर
राजनीतिक एक्सपर्टों के मुताबिक बिहार-यूपी में बीजेपी की विरोधी पार्टियां वर्ष 2024 के आम चुनावों तक इसी रणनीति पर चलती रहेंगी. उनकी ओर से लगातार दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के मुद्दे उठाए जाएंगे, जिससे समाज के एक बड़े वर्ग को मैसेज दिया जा सके कि उनके साथ नाइंसाफी हो रही है. ऐसे में अगर हिंदू समाज का छोटा सा भी हिस्सा बीजेपी से छिटकता है तो अपनी जातियों और एक खास वर्ग के वोटों के जरिए विरोधी पार्टियां आसानी से चुनाव में जीत हासिल कर सकती हैं.
(भारत की पहली पसंद ZeeHindi.com - अब किसी और की ज़रूरत नहीं)